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मुझको इंसान बनाया किसने ?



कुछ कहते थे बिल्कुल “मैं आसान नहीं..”
फिर मुझको आसान बनाया किसने ?

बादल के उन छोटे-छोटे टुकड़ों को
सी-सी कर आसमान बनाया किसने ?

धूल जमीं अतीत के पन्नों को सब भूले
उस भूले-बिसरे को पहचान बनाया किसने ?

हर रोज गरीबी में मर कर जो जीते थे
उनकों हर दुःख से अनजान बनाया किसने ?

कुछ लोगों ने ठोकर मारी ‘पत्थर’ कहकर
फिर उस पत्थर को भगवान बनाया किसने ?

मैंने देखा है बनते माटी के देवों को
फिर मुझको इंसान बनाया किसने ?


- कवि कुमार अशोक 

जीवन की परिभाषा



तुम जीने की हो अभिलाषा,

तुम हो जीवन की परिभाषा

तुम प्राण हो तुम श्वास हो,

तुम आस्था विश्वाश हो

तुम हो मेरी आराधना,

मेरे मन की कल्पना

मेरे जीवन की प्रेरणा


- कवि कुमार अशोक 

दिल की कलम से


किताबों में अक्सर तुम मिलती हो मुझसे

कभी घर भी मेरे तुम आना प्रिये

वो सावन का झूला वो बारिश की बूँदें

मेरा दिल भी तुम साथ लाना प्रिये


शयन कक्ष में तुम न जाना प्रिये

वहाँ तुमको टूटा दर्पण मिलेगा

संभलकर के रखना कदम धीरे-धीरे

अन्यथा रक्त मेरे ह्रदय से बहेगा


यदि आना हो मन के इस आंगन में तुमको

तो मेरी कल्पना बनकर आना प्रिये

कागज़ के पन्नों पर दिल की कलम से

मेरी प्रेरणा बनकर छाना प्रिये


जो छिपाकर रखे थे किताबों में मैंने

उन गुलाबों को फिर से महकाना प्रिये

तेरा रूठ जाना तुम्हें फिर मनाना

जरा फिर वो किस्सा सुनना प्रिये


- कवि कुमार अशोक


   

नारी की लाज



चाँद सा चमकता चेहरा

आज क्यों है मौन सा ?
माँग से है जो मिटा
रंग था वो कौन सा ?
वो प्रीत था या प्राण था
वो वज्र था या बाण था ?
उसका भी रंग लाल था
वो अबीर या गुलाल था ?
आज तू मुझे बता
ये चीर क्यों सफ़ेद है ?
क्या छुपा रही है मुझसे
कौन सा वो भेद है ?
मेंहदी का रंग क्यों छुटा
ये नौलखा है क्यों टुटा ,
क्यों पैंजनी बेजान है
क्यों घर बना शमशान है ?
थी खनकती चूड़ीयाँ  ‌‍‌‍
वो आज क्यों खामोश है ,
सँवरती जिसमे देख कर
वो आईना बेहोश है I
वीरों की पिचकारीयाँ
चला रही थी गोलियाँ ,
छींटा पड़ा जो लाल था
वो अबीर या गुलाल था ?
स्वप्न को सँजोने वाली
आँख तेरी क्यों है नम ,
आग बनी सिसकीयाँ
अश्रु बन गये हैं बम I
वो शहीद हो गया
वक्ष से था जो बहा ,
उसका भी रंग लाल था
वो अबीर या गुलाल था ?
खो दिया है तुने जिसको
देश का वो गर्व है ,
ये होली है शहीद की
शहीद का ये पर्व है I
तिरंगा ऊँचा है खड़ा
धरा पर लतफत पड़ा ,
देश का वो लाल था
क्या अबीर क्या गुलाल था ?


- कवि कुमार अशोक 



सुबह-सुबह चिड़िया उठकर



सुबह-सुबह चिड़िया उठकर

जब मीठे गीत सुनाती है,

नन्हीं कोमल प्यारी कलियाँ

जब झुरमुट से मुस्कातीं हैं।

जब शीतल मंद बयार चले

एक खुशबू सी छा जाती है। 

थम जाए इस दिल कि धड़कन

और याद तुम्हारी आती है। 

 --

जब रंग बिरंगे फूल खिले

और हरियाली छा जाती है।

आम की डाली पर बैठी

जब कोयल कूक लगाती है।

मेंड़ों पर चलती मधुबाला

जब पायल को छनकती है।

थम जाए इस दिल कि धड़कन

और याद तुम्हारी आती है। 

 --

 जब ढलते सूरज की लाली

नील गगन में छाये

धानों की बाली मतवाली 

जब खेतों में लहराये।

सरसर बहती पुरवईया

जब गीत बसंती के गाती है,

थम जाए इस दिल कि धड़कन

और याद तुम्हारी आती है !


- कवि कुमार अशोक 


प्रेम

कवि कुमार अशोक 

यदि सच्चा है तो
प्रेम बहता है आँखों से,
यदि विश्वाश पूर्ण है तो
प्रेम कहता है आँखों से,
यदि निश्छल हो तो
प्रेम होता है आँखों से,
यदि जरा भी छल हो तो
प्रेम खोता है आँखों से,
यदि अटल हो तो
प्रेम भरता है आँखों से,
यदि कुटिल हो तो
प्रेम मरता है आँखों से। 

                            

कवि कुमार अशोक