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मेरी कलम

मेरी कलम कभी-कभी

हठ करती है सच लिखने का

पर मैं अक्सर उसे

फुसला लेता हूँ

नीले की जगह चुपके से

काली दवात भर देता हूँ

--

क्या पता मैं उससे या खुद से ही

छल करता हूँ

वह सच को सचही लिखती है

और मैं..

सच पढ़ने से भी डरता हूँ

--

फिर सहसा एक विचार आता है कि

उसकी जिह्वा ही बदल दूँ

या कि लोभ दूँ चमकीले ढक्कन का

और उसकी

सच लिखने की आदतको ही ढक दूँ

--

लेकिन क्या चमकीले ढक्कन से

कलम की अच्छाई बदलेगी ?

अन्यथा कलम बदलने से

क्या सच्चाई बदलेगी ?

नहर



खेतों के आलिंगन

मेड़ों का चुम्बन,

ऊसर के लांक्षन 

सहती है नहर,

खेतों के बीच से 

बहती है नहर .. 

खेतों को देती है

अपना वो तन मन,

फसलों पर न्योछवार

करती है यौवन,

बंजर धारा को 

दे देती है जीवन,

क्यूँ एक अबला सी

रहती है नहर,

खेतों के बीच से 

बहती है नहर..

सूखे और बाढ़ का 

लेकर कलंक,

बहती चुपचाप वो

मधुर जलतरंग,

सरिता से पीड़ा

कहती है नहर,

खेतों के बीच से 

बहती है नहर..

पुच्छल तारा



वह पुच्छल तारा आसमान का टूटा सा,

वह टहनी अपने ही तरुवर से छूटा सा !

वह ओस की बूंदों जैसा पत्तों पर बैठा,

वह जैसे कोई बेल हो पेड़ों में ऐंठा !

वह टूटे नीड़ के तिनके तिनके सा बिखरा,

वह जैसे कोई गीत हो भूला और बिसरा !

वह घुप्प अंधेरों में एक नन्हा जुगनू सा

वह जैसे कोने में रखा एक मंजूषा

वह सहमा-सहमा सा थोडा सा डरा-डरा

वह पतझड़ के पीले पत्तों सा झरा-झरा

वह अपना होकर भी अपनों से छँटा-छँटा

वह अपना हो कर भी अपनों में बँटा-बँटा


- कवि कुमार अशोक 



पीली तितली



देखा
मैंने पीली तितली
एक दिन अपनी बगिया में,
भरती उड़ान मस्तानी चाल
छिपती फूलों की डलीया में
पिताम्बरी वर्ण के युग्म पर
मोह लेती मेरा मन,
कंचन सा उसका कोमल तन
लगता यूँ मानों स्वर्ण-सुमन
जब शाम हुयी तो प्रभाकर
अपनी किरणों को बटोरता,
उदधि के उमड़े उर के
आड़ में जाकर छिपता
छिप गयी वो पीली तितली भी
हो करके आँखों से ओझल,
फिर भी मन में ये चाहत है
पीली तितली देखूँ पल-पल
           
- कवि कुमार अशोक 

मुझको इंसान बनाया किसने ?



कुछ कहते थे बिल्कुल “मैं आसान नहीं..”
फिर मुझको आसान बनाया किसने ?

बादल के उन छोटे-छोटे टुकड़ों को
सी-सी कर आसमान बनाया किसने ?

धूल जमीं अतीत के पन्नों को सब भूले
उस भूले-बिसरे को पहचान बनाया किसने ?

हर रोज गरीबी में मर कर जो जीते थे
उनकों हर दुःख से अनजान बनाया किसने ?

कुछ लोगों ने ठोकर मारी ‘पत्थर’ कहकर
फिर उस पत्थर को भगवान बनाया किसने ?

मैंने देखा है बनते माटी के देवों को
फिर मुझको इंसान बनाया किसने ?


- कवि कुमार अशोक 

मैं क्या कहूँ और क्या लिखूँ ?




वतन का ज़िक्र आता है तो

मैं सोचता हूँ कि 
मैं क्या करूँ ?
स्तब्ध रहूँ..या कुछ बीती लिखूँ
क्योंकि दोनों ही पड़ाव
असमंजस के हैं
यदि मैं ठूँठ रहा तो
डरता हूँ कि कहीं फिर से
जलिया वाला बाग़ में
खून न बह जाए
और
यदि कुछ लिखूँ
तो कहीं किसी गरीब की अर्ज़ी
बाकी न रह जाए
सत्य-अहिंसा का आग्रह करूँ
तो डर है कि मेरे शब्द
‘गोडसे की गोली’ से न ढह जाए
और यदि
झूठ की काली दवात से लिखूँ
तो कहीं लिखावट
बापू के आंसूओं में न बह जाए
आँख मूँद लूँ
तो डर है कि कहीं
दिल्ली की बसों में
किसी बेटी की लाज न खो जाए
और यदि.. ये ‘त्रिनेत्र’ खोल दूँ
तो डर है कि..कहीं ये
सृष्टि भस्म न हो जाए !
दोराहे पर मैं खड़ा
दुविधा में मैं पड़ा..
कि आखिर सच क्या है ?
गोडसे की बंदूक से निकला
“ हे राम... ! ”
या फिर सरेआम
कचहरी में ‘गीता’ की कुड़की
या फिर बदायूँ में
आम के पेड़ से लटकी वो लड़की
जिसे ,सल्तनत-ए-हिन्दोस्तां ने देखा था ...
ऐ मेरे एहले वतन
मैं क्या कहूँ और क्या लिखूँ 


- कवि कुमार अशोक



नटखट उम्र-औ-जान



इनसे तो अपना रिश्ता
पुराना है
हमने इनको जाना है
पहचाना है
ये बेखबर ही सही
पर हमने इनको
दिल से माना है
न जाने कितने अरसों से
बक बक कर रहें हैं
न रुक रहे हैं
न थक रहें हैं
किसी का शिकवा
तो किसी का
हाल-ए-दिल
फार्म रहें हैं
छोटे बड़े सपनों को समेटे
बस चलते जा रहें हैं
इनकी चपर चपर कानों में
बजते हैं
इनके लतीफे सर पर
बड़े जोर से लगते हैं
चोट लगती है दिल पर
फिर भी इनसे
दिल लगाता हूँ
सिर्फ इनकी एक मुस्कराहट पर
इनकी सारी
गुस्ताखियाँ भूल जाता हूँ
जिंदगी का हर नगमा
हर नज्म
अपने आँचल में समेटे
जब किसी कोने से पुकारते हैं
तो ...
जिंदगी अंधेरों में भी साफ़
नज़र आती है
ये बेखौफ़ चलते हैं
हमारी धड़कनें ठहर जातीं हैं
प्यार इस कदर है इनसे  
कि ..
ये दूर हों हमसे
तो..
जिंदगी कम हो जाती है
और करीब आयें तो
आँखें नम हो जातीं हैं
ये नटखट उम्र-औ-जान
और जिंदगी बेहिसाब बाकी है ..


- कवि कुमार अशोक 





नारी की लाज



चाँद सा चमकता चेहरा

आज क्यों है मौन सा ?
माँग से है जो मिटा
रंग था वो कौन सा ?
वो प्रीत था या प्राण था
वो वज्र था या बाण था ?
उसका भी रंग लाल था
वो अबीर या गुलाल था ?
आज तू मुझे बता
ये चीर क्यों सफ़ेद है ?
क्या छुपा रही है मुझसे
कौन सा वो भेद है ?
मेंहदी का रंग क्यों छुटा
ये नौलखा है क्यों टुटा ,
क्यों पैंजनी बेजान है
क्यों घर बना शमशान है ?
थी खनकती चूड़ीयाँ  ‌‍‌‍
वो आज क्यों खामोश है ,
सँवरती जिसमे देख कर
वो आईना बेहोश है I
वीरों की पिचकारीयाँ
चला रही थी गोलियाँ ,
छींटा पड़ा जो लाल था
वो अबीर या गुलाल था ?
स्वप्न को सँजोने वाली
आँख तेरी क्यों है नम ,
आग बनी सिसकीयाँ
अश्रु बन गये हैं बम I
वो शहीद हो गया
वक्ष से था जो बहा ,
उसका भी रंग लाल था
वो अबीर या गुलाल था ?
खो दिया है तुने जिसको
देश का वो गर्व है ,
ये होली है शहीद की
शहीद का ये पर्व है I
तिरंगा ऊँचा है खड़ा
धरा पर लतफत पड़ा ,
देश का वो लाल था
क्या अबीर क्या गुलाल था ?


- कवि कुमार अशोक