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पीली तितली



देखा
मैंने पीली तितली
एक दिन अपनी बगिया में,
भरती उड़ान मस्तानी चाल
छिपती फूलों की डलीया में
पिताम्बरी वर्ण के युग्म पर
मोह लेती मेरा मन,
कंचन सा उसका कोमल तन
लगता यूँ मानों स्वर्ण-सुमन
जब शाम हुयी तो प्रभाकर
अपनी किरणों को बटोरता,
उदधि के उमड़े उर के
आड़ में जाकर छिपता
छिप गयी वो पीली तितली भी
हो करके आँखों से ओझल,
फिर भी मन में ये चाहत है
पीली तितली देखूँ पल-पल
           
- कवि कुमार अशोक 

सब कुछ हार गया



ये बैरी जग बहुरूपियों का
जीते हैं मुखौटों के भीतर
क्रोघ,घृणा और दंभ ग्रसित
दुर्बल के रक्त को पी-पी कर
ये पाषण ह्रदय वाले दानव
उत्पात करें अधिकारों पर
जब बात करे कर्तव्यों की
मुक्का कस दें लाचारों पर 
इन छलियों के द्यूतक्रीड़ा में
मुझ निर्छल का संसार गया
आज मैं सब कुछ हार गया  

- कवि कुमार अशोक 

मुझको इंसान बनाया किसने ?



कुछ कहते थे बिल्कुल “मैं आसान नहीं..”
फिर मुझको आसान बनाया किसने ?

बादल के उन छोटे-छोटे टुकड़ों को
सी-सी कर आसमान बनाया किसने ?

धूल जमीं अतीत के पन्नों को सब भूले
उस भूले-बिसरे को पहचान बनाया किसने ?

हर रोज गरीबी में मर कर जो जीते थे
उनकों हर दुःख से अनजान बनाया किसने ?

कुछ लोगों ने ठोकर मारी ‘पत्थर’ कहकर
फिर उस पत्थर को भगवान बनाया किसने ?

मैंने देखा है बनते माटी के देवों को
फिर मुझको इंसान बनाया किसने ?


- कवि कुमार अशोक 

जीवन की परिभाषा



तुम जीने की हो अभिलाषा,

तुम हो जीवन की परिभाषा

तुम प्राण हो तुम श्वास हो,

तुम आस्था विश्वाश हो

तुम हो मेरी आराधना,

मेरे मन की कल्पना

मेरे जीवन की प्रेरणा


- कवि कुमार अशोक 

दिल की कलम से


किताबों में अक्सर तुम मिलती हो मुझसे

कभी घर भी मेरे तुम आना प्रिये

वो सावन का झूला वो बारिश की बूँदें

मेरा दिल भी तुम साथ लाना प्रिये


शयन कक्ष में तुम न जाना प्रिये

वहाँ तुमको टूटा दर्पण मिलेगा

संभलकर के रखना कदम धीरे-धीरे

अन्यथा रक्त मेरे ह्रदय से बहेगा


यदि आना हो मन के इस आंगन में तुमको

तो मेरी कल्पना बनकर आना प्रिये

कागज़ के पन्नों पर दिल की कलम से

मेरी प्रेरणा बनकर छाना प्रिये


जो छिपाकर रखे थे किताबों में मैंने

उन गुलाबों को फिर से महकाना प्रिये

तेरा रूठ जाना तुम्हें फिर मनाना

जरा फिर वो किस्सा सुनना प्रिये


- कवि कुमार अशोक


   

मैं क्या कहूँ और क्या लिखूँ ?




वतन का ज़िक्र आता है तो

मैं सोचता हूँ कि 
मैं क्या करूँ ?
स्तब्ध रहूँ..या कुछ बीती लिखूँ
क्योंकि दोनों ही पड़ाव
असमंजस के हैं
यदि मैं ठूँठ रहा तो
डरता हूँ कि कहीं फिर से
जलिया वाला बाग़ में
खून न बह जाए
और
यदि कुछ लिखूँ
तो कहीं किसी गरीब की अर्ज़ी
बाकी न रह जाए
सत्य-अहिंसा का आग्रह करूँ
तो डर है कि मेरे शब्द
‘गोडसे की गोली’ से न ढह जाए
और यदि
झूठ की काली दवात से लिखूँ
तो कहीं लिखावट
बापू के आंसूओं में न बह जाए
आँख मूँद लूँ
तो डर है कि कहीं
दिल्ली की बसों में
किसी बेटी की लाज न खो जाए
और यदि.. ये ‘त्रिनेत्र’ खोल दूँ
तो डर है कि..कहीं ये
सृष्टि भस्म न हो जाए !
दोराहे पर मैं खड़ा
दुविधा में मैं पड़ा..
कि आखिर सच क्या है ?
गोडसे की बंदूक से निकला
“ हे राम... ! ”
या फिर सरेआम
कचहरी में ‘गीता’ की कुड़की
या फिर बदायूँ में
आम के पेड़ से लटकी वो लड़की
जिसे ,सल्तनत-ए-हिन्दोस्तां ने देखा था ...
ऐ मेरे एहले वतन
मैं क्या कहूँ और क्या लिखूँ 


- कवि कुमार अशोक



नटखट उम्र-औ-जान



इनसे तो अपना रिश्ता
पुराना है
हमने इनको जाना है
पहचाना है
ये बेखबर ही सही
पर हमने इनको
दिल से माना है
न जाने कितने अरसों से
बक बक कर रहें हैं
न रुक रहे हैं
न थक रहें हैं
किसी का शिकवा
तो किसी का
हाल-ए-दिल
फार्म रहें हैं
छोटे बड़े सपनों को समेटे
बस चलते जा रहें हैं
इनकी चपर चपर कानों में
बजते हैं
इनके लतीफे सर पर
बड़े जोर से लगते हैं
चोट लगती है दिल पर
फिर भी इनसे
दिल लगाता हूँ
सिर्फ इनकी एक मुस्कराहट पर
इनकी सारी
गुस्ताखियाँ भूल जाता हूँ
जिंदगी का हर नगमा
हर नज्म
अपने आँचल में समेटे
जब किसी कोने से पुकारते हैं
तो ...
जिंदगी अंधेरों में भी साफ़
नज़र आती है
ये बेखौफ़ चलते हैं
हमारी धड़कनें ठहर जातीं हैं
प्यार इस कदर है इनसे  
कि ..
ये दूर हों हमसे
तो..
जिंदगी कम हो जाती है
और करीब आयें तो
आँखें नम हो जातीं हैं
ये नटखट उम्र-औ-जान
और जिंदगी बेहिसाब बाकी है ..


- कवि कुमार अशोक 





नारी की लाज



चाँद सा चमकता चेहरा

आज क्यों है मौन सा ?
माँग से है जो मिटा
रंग था वो कौन सा ?
वो प्रीत था या प्राण था
वो वज्र था या बाण था ?
उसका भी रंग लाल था
वो अबीर या गुलाल था ?
आज तू मुझे बता
ये चीर क्यों सफ़ेद है ?
क्या छुपा रही है मुझसे
कौन सा वो भेद है ?
मेंहदी का रंग क्यों छुटा
ये नौलखा है क्यों टुटा ,
क्यों पैंजनी बेजान है
क्यों घर बना शमशान है ?
थी खनकती चूड़ीयाँ  ‌‍‌‍
वो आज क्यों खामोश है ,
सँवरती जिसमे देख कर
वो आईना बेहोश है I
वीरों की पिचकारीयाँ
चला रही थी गोलियाँ ,
छींटा पड़ा जो लाल था
वो अबीर या गुलाल था ?
स्वप्न को सँजोने वाली
आँख तेरी क्यों है नम ,
आग बनी सिसकीयाँ
अश्रु बन गये हैं बम I
वो शहीद हो गया
वक्ष से था जो बहा ,
उसका भी रंग लाल था
वो अबीर या गुलाल था ?
खो दिया है तुने जिसको
देश का वो गर्व है ,
ये होली है शहीद की
शहीद का ये पर्व है I
तिरंगा ऊँचा है खड़ा
धरा पर लतफत पड़ा ,
देश का वो लाल था
क्या अबीर क्या गुलाल था ?


- कवि कुमार अशोक 



बेईमानी का डिप्लोमा



आज के जमाने में

ईमानदारी का क्या रूप है,

उसका क्या स्वरुप है

ये जानने के लिए सोचा,

तो एक आम आदमी से पूछा

उसने कहा

 

ये ईमानदारी है एक लाचारी

आप पर हँसेगी दुनिया सारी

अगर आप ईमानदार हैं‍‌

एक तो नौकरी नहीं मिलती

उसपर भी आप ईमानदार

तो सब से बड़ी गलती  

 

आप जहाँ भी जायेंगे

बस गालियाँ ही खायेंगे

मार कर भगा दिए जायेंगे

अगर आप ईमानदार हैं

 

आप चीखेंगे चिल्लायेंगे

आप की कोई नहीं सुनेगा

ऊपर से चार जूते धुनेगा

अगर आप ईमानदार हैं

 

आप को कोई नौकरी नहीं देगा

कितना भी सोर्स लगावो

नीचे से पैसा दबावो ,

बड़ी से बड़ी डिग्री लावो

चाहे भूखों मर जावो

नौकरी तब पाओगे

जब ...

बेईमानी का डिप्लोमा दिखाओगे

 

वरना ढूँढते रह जाओगे

खाली हाथ घर जाओगे

घरवालों से गालियाँ खावोगे

 

मरने जाओगे

मर भी नहीं पावोगे

और गलती से मर गये...

तो...

ऊपर क्या काला मुँह लेकर जाओगे ?

 

वहाँ के सुखों को भी नहीं भोग पावोगे

सुंदर अप्सराओं का डी जे

नहीं देख पावोगे

किसी कोने में चुप चाप

खड़े रह जावोगे

आप को प्रवेश नहीं मिलेगा !

क्योंकि उसके लिए भी ..

बेईमानी का टिकट लगेगा ....

 

- कवि कुमार अशोक

 

 

 

 

 

प्रेम

कवि कुमार अशोक 

यदि सच्चा है तो
प्रेम बहता है आँखों से,
यदि विश्वाश पूर्ण है तो
प्रेम कहता है आँखों से,
यदि निश्छल हो तो
प्रेम होता है आँखों से,
यदि जरा भी छल हो तो
प्रेम खोता है आँखों से,
यदि अटल हो तो
प्रेम भरता है आँखों से,
यदि कुटिल हो तो
प्रेम मरता है आँखों से। 

                            

कवि कुमार अशोक