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मेरी कलम

मेरी कलम कभी-कभी

हठ करती है सच लिखने का

पर मैं अक्सर उसे

फुसला लेता हूँ

नीले की जगह चुपके से

काली दवात भर देता हूँ

--

क्या पता मैं उससे या खुद से ही

छल करता हूँ

वह सच को सचही लिखती है

और मैं..

सच पढ़ने से भी डरता हूँ

--

फिर सहसा एक विचार आता है कि

उसकी जिह्वा ही बदल दूँ

या कि लोभ दूँ चमकीले ढक्कन का

और उसकी

सच लिखने की आदतको ही ढक दूँ

--

लेकिन क्या चमकीले ढक्कन से

कलम की अच्छाई बदलेगी ?

अन्यथा कलम बदलने से

क्या सच्चाई बदलेगी ?

नहर



खेतों के आलिंगन

मेड़ों का चुम्बन,

ऊसर के लांक्षन 

सहती है नहर,

खेतों के बीच से 

बहती है नहर .. 

खेतों को देती है

अपना वो तन मन,

फसलों पर न्योछवार

करती है यौवन,

बंजर धारा को 

दे देती है जीवन,

क्यूँ एक अबला सी

रहती है नहर,

खेतों के बीच से 

बहती है नहर..

सूखे और बाढ़ का 

लेकर कलंक,

बहती चुपचाप वो

मधुर जलतरंग,

सरिता से पीड़ा

कहती है नहर,

खेतों के बीच से 

बहती है नहर..

कितनी बार समझाया



कितनी बार समझाया

कि. . .

वहाँ मत जाया करो

वहाँ किसी की बेवफाई है

और मेरी तनहाई है

उन दीवारों से मत पूछना

वो तुम्हें दगा देंगे

नाम पूछोगे मेरा

वो कुछ और बता देंगे

क्योंकि . . .

दीवारों पर जमी काई

के नीचे सच्चाई

का दम घुट रहा है

दरारों में होड़ लगी है

और रंग छुट रहा है

कुछ लोगों का कहना है कि

ये भूतिया घर है

नोट बंदी के भूत का

लोगों में डर है

दिवार पर टँगे बापू

बेबस और मूक है

कोने में पड़ी आलमारी

में इमानदारी दो टूक है

धर्म अपने कर्म पर रो रहा है

अधर्म अनायास खुश हो रहा है

सत्य मेव जयते अब धुंधला सा है

आज़ादी का स्वाद कुछ बदला सा है

रोटी के डिब्बे में

बंद लोकतंत्र है

घर की देहलीज पर

गधों का आतंक है

उसी देहलीज पर अब

किसान रोते है

उनकी हर आह पर

जुमलेबाज खुश होते हैं

घर के किवाड़ कुण्डियाँ

सब ऐठे हैं

कुर्सियों पर अब कुकुरमुत्ते

बैठे हैं

मर्यादा की पूस से बना छज्जा

सिसक रहा है

न्याय का फर्स भी

अब खिसक रहा है

ठेका मिला जिनको नीड़ के निर्माण का

उन्होंने ही दगा दिया

ईमानदारी की ईंटों पर

भ्रष्टाचार का प्लास्टर लगा दिया

झूठे वादों की झूठी कहानी

मैं वहीँ छोड़ आया हूँ

बस एक सच्ची गरीबी थी

जिसे साथ लाया हूँ

अब तुम वहाँ मत जाना

अन्यथा असहिष्णुता का भूत जग जायेंगे

तुम सोचते रह जाओगे

और देशद्रोह के आरोप लग जायेंगे..


- कवि कुमार अशोक 

 

पुच्छल तारा



वह पुच्छल तारा आसमान का टूटा सा,

वह टहनी अपने ही तरुवर से छूटा सा !

वह ओस की बूंदों जैसा पत्तों पर बैठा,

वह जैसे कोई बेल हो पेड़ों में ऐंठा !

वह टूटे नीड़ के तिनके तिनके सा बिखरा,

वह जैसे कोई गीत हो भूला और बिसरा !

वह घुप्प अंधेरों में एक नन्हा जुगनू सा

वह जैसे कोने में रखा एक मंजूषा

वह सहमा-सहमा सा थोडा सा डरा-डरा

वह पतझड़ के पीले पत्तों सा झरा-झरा

वह अपना होकर भी अपनों से छँटा-छँटा

वह अपना हो कर भी अपनों में बँटा-बँटा


- कवि कुमार अशोक 



पीली तितली



देखा
मैंने पीली तितली
एक दिन अपनी बगिया में,
भरती उड़ान मस्तानी चाल
छिपती फूलों की डलीया में
पिताम्बरी वर्ण के युग्म पर
मोह लेती मेरा मन,
कंचन सा उसका कोमल तन
लगता यूँ मानों स्वर्ण-सुमन
जब शाम हुयी तो प्रभाकर
अपनी किरणों को बटोरता,
उदधि के उमड़े उर के
आड़ में जाकर छिपता
छिप गयी वो पीली तितली भी
हो करके आँखों से ओझल,
फिर भी मन में ये चाहत है
पीली तितली देखूँ पल-पल
           
- कवि कुमार अशोक 

सब कुछ हार गया



ये बैरी जग बहुरूपियों का
जीते हैं मुखौटों के भीतर
क्रोघ,घृणा और दंभ ग्रसित
दुर्बल के रक्त को पी-पी कर
ये पाषण ह्रदय वाले दानव
उत्पात करें अधिकारों पर
जब बात करे कर्तव्यों की
मुक्का कस दें लाचारों पर 
इन छलियों के द्यूतक्रीड़ा में
मुझ निर्छल का संसार गया
आज मैं सब कुछ हार गया  

- कवि कुमार अशोक 

मुझको इंसान बनाया किसने ?



कुछ कहते थे बिल्कुल “मैं आसान नहीं..”
फिर मुझको आसान बनाया किसने ?

बादल के उन छोटे-छोटे टुकड़ों को
सी-सी कर आसमान बनाया किसने ?

धूल जमीं अतीत के पन्नों को सब भूले
उस भूले-बिसरे को पहचान बनाया किसने ?

हर रोज गरीबी में मर कर जो जीते थे
उनकों हर दुःख से अनजान बनाया किसने ?

कुछ लोगों ने ठोकर मारी ‘पत्थर’ कहकर
फिर उस पत्थर को भगवान बनाया किसने ?

मैंने देखा है बनते माटी के देवों को
फिर मुझको इंसान बनाया किसने ?


- कवि कुमार अशोक