दबंग दुनिया न्यूज चैनल के कवि सम्मलेन में कवि कुमार अशोक
Kavi Kumar Ashok is a young Indian poet and writer. This Blog is dedicated to him and his Literary work. He is Honored with "Vishwas Trophy Award in 2005.
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पीली तितली
एक दिन अपनी बगिया में,
भरती उड़ान मस्तानी चाल
छिपती फूलों की डलीया में
पिताम्बरी वर्ण के युग्म पर
मोह लेती मेरा मन,
कंचन सा उसका कोमल तन
लगता यूँ मानों स्वर्ण-सुमन
जब शाम हुयी तो प्रभाकर
अपनी किरणों को बटोरता,
उदधि के उमड़े उर के
आड़ में जाकर छिपता
छिप गयी वो पीली तितली भी
हो करके आँखों से ओझल,
फिर भी मन में ये चाहत है
पीली तितली देखूँ पल-पल
- कवि कुमार अशोक
सब कुछ हार गया
ये बैरी जग बहुरूपियों का
जीते हैं मुखौटों के भीतर
क्रोघ,घृणा और दंभ ग्रसित
दुर्बल के रक्त को पी-पी कर
ये पाषण ह्रदय वाले दानव
उत्पात करें अधिकारों पर
जब बात करे कर्तव्यों की
मुक्का कस दें लाचारों पर
इन छलियों के द्यूतक्रीड़ा में
मुझ निर्छल का संसार गया
आज मैं सब कुछ हार गया
- कवि कुमार अशोक
जीवन की परिभाषा
तुम जीने की हो अभिलाषा,
तुम हो जीवन की परिभाषा।
तुम प्राण हो तुम श्वास हो,
तुम आस्था विश्वाश हो।
तुम हो मेरी आराधना,
मेरे मन की कल्पना
मेरे जीवन की प्रेरणा।
- कवि कुमार अशोक
मैं क्या कहूँ और क्या लिखूँ ?
मैं सोचता हूँ कि
मैं क्या करूँ ?
स्तब्ध रहूँ..या कुछ बीती लिखूँ
क्योंकि दोनों ही पड़ाव
असमंजस के हैं
यदि मैं ठूँठ रहा तो
डरता हूँ कि कहीं फिर से
जलिया वाला बाग़ में
खून न बह जाए
और
यदि कुछ लिखूँ
तो कहीं किसी गरीब की अर्ज़ी
बाकी न रह जाए
सत्य-अहिंसा का आग्रह करूँ
तो डर है कि मेरे शब्द
‘गोडसे की गोली’ से न ढह जाए
और यदि
झूठ की काली दवात से लिखूँ
तो कहीं लिखावट
बापू के आंसूओं में न बह जाए
आँख मूँद लूँ
तो डर है कि कहीं
दिल्ली की बसों में
किसी बेटी की लाज न खो जाए
और यदि.. ये ‘त्रिनेत्र’ खोल दूँ
तो डर है कि..कहीं ये
सृष्टि भस्म न हो जाए !
दोराहे पर मैं खड़ा
दुविधा में मैं पड़ा..
कि आखिर सच क्या है ?
गोडसे की बंदूक से निकला
“ हे राम... ! ”
या फिर सरेआम
कचहरी में ‘गीता’ की कुड़की
या फिर बदायूँ में
आम के पेड़ से लटकी वो लड़की
जिसे ,सल्तनत-ए-हिन्दोस्तां ने देखा था ...
ऐ मेरे एहले वतन
मैं क्या कहूँ और क्या लिखूँ
- कवि कुमार अशोक
नटखट उम्र-औ-जान
इनसे तो अपना रिश्ता
पुराना है
हमने इनको जाना है
पहचाना है
ये बेखबर ही सही
पर हमने इनको
दिल से माना है
न जाने कितने अरसों से
बक बक कर रहें हैं
न रुक रहे हैं
न थक रहें हैं
किसी का शिकवा
तो किसी का
हाल-ए-दिल
फार्म रहें हैं
छोटे बड़े सपनों को समेटे
बस चलते जा रहें हैं
इनकी चपर चपर कानों में
बजते हैं
इनके लतीफे सर पर
बड़े जोर से लगते हैं
चोट लगती है दिल पर
फिर भी इनसे
दिल लगाता हूँ
सिर्फ इनकी एक मुस्कराहट पर
इनकी सारी
गुस्ताखियाँ भूल जाता हूँ
जिंदगी का हर नगमा
हर नज्म
अपने आँचल में समेटे
जब किसी कोने से पुकारते हैं
तो ...
जिंदगी अंधेरों में भी साफ़
नज़र आती है
ये बेखौफ़ चलते हैं
हमारी धड़कनें ठहर जातीं हैं
प्यार इस कदर है इनसे
कि ..
ये दूर हों हमसे
तो..
जिंदगी कम हो जाती है
और करीब आयें तो
आँखें नम हो जातीं हैं
ये नटखट उम्र-औ-जान
और जिंदगी बेहिसाब बाकी है ..
- कवि कुमार अशोक
मैंने अक्सर देखा है
किसी की “प्रेरणा” को
कहानी बनकर
पन्नों पर उतरते हुए ,
शब्दों कि तलाश में
हर मोंड से गुजरते हुए !
किसी के नसीब से
जिंदगी को करीब से
मैंने अक्सर देखा है ,
ये जाँचा है ये परखा है !
वक्त के साथ साथ
लोगों को बदलते हुए ,
विश्वास को टूट कर
आँखों से ढलते हुए !
जाने पहचाने चेहरों को
अनजान बनकर चलते हुए
मैंने अक्सर देखा है ,
ये जाँचा है ये परखा है !
आँखों को सपने बुनते हुए
रातों को खुले आसमान में
किस्मत के सितारे को ढूँढते हुए ,
चाँद कि दुधिया रोशनीं में
किसी के चेहरे को भाँपते हुए !
नयी सुबह के इंतज़ार में
किसी को सारी रात जागते हुए
मैंने अक्सर देखा है ,
ये जाँचा है ये परखा है !
आस्था के आँचल में
पत्थर कि पूजा करते हुए ,
मूक निर्जीव शिला समक्ष
हाँथ जोड़कर शीश धरते हुए !
अमीर-गरीब के फर्क को
दुःख को दर्द को
जाना है...
रोटी की कीमत,और
रिश्तों कि एहमियत को
पहचाना है...
हर मोड़ पर हमको रुलाते हुए
जिंदगी को हमसे रूठ कर जाते हुए
मैंने अक्सर देखा है ,
ये जाँचा है ये परखा है !
- कवि कुमार अशोक
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